प्रमोशन में आरक्षण सरकार का खतरनाक खेल ....

पर शर्त एम० नागराज मामले मे कोर्ट द्वारा दिये गये शर्तो एंव फाइन्डिग को ध्यान मे रखकर। यह भी प्रमोशन संबिधान पीठ के अंतिम निर्णय आने तक के अंतर्गत रहेगा। अब मोदी जी ने बिना संसद मे चर्चा कराये कैबिनेट से पास करवा कर राष्ट्रपति से हस्ताक्षर करवा कर दिनांक 15जून 2018 को प्रमोशन में आरक्षण लागू कर दिया।इससे सीधा असर सवर्णों व बैकवर्डो पर पड़ा। चूंकि प्रमोशन मे आरक्षण का लाभ केवल व केवल दलितों को है। अब देश के सवर्णों व बैकवर्डो इस बात को ध्यान देने की आवश्यकता है कि यह प्रमोशन में आरक्षण सरकार द्वारा लागू किया गया है कोर्ट का कोई आदेश नही है

प्रमोशन में आरक्षण सरकार का खतरनाक खेल ....

प्रारंभ में संविधान में नौकरियों में प्रमोशन के आरक्षण का प्रावधान नही था अर्थात मूल संबिधान में प्रमोशन में आरक्षण की नामोनिशान  ही नही था। बल्कि राजनेता अपने वोट की राजनीति के चक्कर में नौकरियों में प्रमोशन का आरक्षण लाये। वो भी संबिधान में अध्यादेश के माध्यम से। हमारे समाज के वो सजग प्रहरी इन्द्रा साहनी ने मामले को सर्वोच्च न्यायालय में इस आधार पर चुनौती दी कि "यह मूल अधिकार का हनन है"।  देश एक, संबिधान एक, नागरिकता एक, मूल अधिकार एक तो समाज में दोयम दर्जे का बर्ताव नहीं हो सकता। इन्द्रा साहनी के मामले में मा० सर्वोच्च न्यायालय की 09 सदस्यीय संविधान पीठ ने 16 नवम्बर 1992 में पदोन्नति में आरक्षण को असंवैधानिक करार दिया था।मगर राजनेताओं ने जब सर्वोच्च न्यायालय के  आदेश को नही मानना चाहा ,तो इस निर्णय को निष्प्रभावी करने हेतु 17 जून 1995 को 77वां संविधान संशोधन  का बिल लेकर आये और क्या कांग्रेस क्या भाजपा और सभी क्षेत्रीय दलों ने समर्थन करके पदोन्नति में आरक्षण का प्रावधान कर दिया  इसी प्रकार जून 2000 मे वोट के भूखे राजनीतिक दलों ने82वां संविधान संशोधन कर एस०सी०/एस०टी० के लिए प्रमोशन के मापदंड व नियमों को सरल व शिथिल करने का बिल पास करा लिया। ये राजनीतिक दल यही नही रुके बल्कि 4 जनवरी2002 को 85वां संबिधान संशोधन कर संसद से परिणामी ज्येष्ठता देने के लिए कानून बनवा लियें। इन सभी संशोधनों को बंगलौर निवासी एम० नागराज जी ने मा०सुप्रीम कोर्ट में चैलेंज किया, अक्टूबर2006 में देश की सर्वोच्च न्यायालय की 5सदस्यीय संविधान पीठ ने निर्णय देते हुए कहा कि प्रमोशन में आरक्षण देने से पहले प्रत्येक मामले मे क्वान्टीफिएबल डाटा देकर यह साबित करना आवश्यक होगा कि जिस किसी व्यक्ति को प्रोन्नति में आरक्षण दिया जा रहा, क्या वह अभी भी पिछड़ा है?नौकरियों / सेवाओं में उसकी जाति का समुचित व पर्याप्त प्रतिनिधित्व नही है? तथा ऐसे कनिष्ठ कार्मिक का प्रोन्नति करने से संबिधान की मूल धारा 335( समानता का मौलिक अधिकार) में निहित प्रशासनिक दक्षता व कार्यप्रणाली की शर्त पर विपरीत प्रभाव तो नही पड़ रहा है? एम० नागराज के इस मामले मे मा० सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रतिपादित उपरोक्त सभी बाध्यकारी मानक व शर्तों के परिणाम स्वरूप7 दिसंबर 2010 को राजस्थान के मामले में व 27अप्रैल2012 को उत्तर प्रदेश के मामले में, और 9 फरवरी2017 को कर्नाटक के मामले में मा० सुप्रीम कोर्ट की विभिन्न अलग अलग बेंचों ने प्रमोशन मे आरक्षण देने के इन राज्यों के सरकारों के आदेशों को असंवैधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया था। विदित हो कि उपरोक्त मामले में प्रथम निर्णय राजस्थान सरकार के खिलाफ आया इसके बाद उत्तर प्रदेश व कर्नाटक सरकार के खिलाफ मा० सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया था। ये निर्णय मा० सर्वोच्च न्यायालय की अलग अलग बेंचों ने दी थी। चूंकि सर्वोच्च न्यायालय में एम० नागराज के मामले संबिधान पीठ का पहले ही निर्णय आ चुका था अतः उपरोक्त तीनों ही निर्णयों पर एम० नागराज के प्रकरण का निर्णय प्रभावकारी रहा। पुनः एम०नागराज के निर्णय के खिलाफ 2012 मे मनमोहन सिंह की सरकार 117वां बिल लेकर आई जिसे भाजपा ने समर्थन किया। बिल राज्य सभा से पास है पर लोक सभा मे  लंबित था। इधर बीच मोदी सरकार दलितों को लुभाने के लिए कोर्ट में पैरवी हेतु ढुलमुलपन रवैया अपनायी एंव सरकारी वकील ने दलितों के पक्ष मे अपनी दलीलें दी। 5जून 2018के सर्वोच्च न्यायालय के आदेश में कही भी यह नहीं कहा गया है कि सरकारें प्रमोशन में आरक्षण करें बल्कि सरकारों को करने व न करने के लिए स्वतंत्र कर दिया है पर शर्त एम० नागराज मामले मे कोर्ट द्वारा दिये गये शर्तो एंव फाइन्डिग को ध्यान मे रखकर। यह भी प्रमोशन संबिधान पीठ के अंतिम निर्णय आने तक के अंतर्गत रहेगा। अब मोदी जी  ने बिना संसद मे चर्चा कराये कैबिनेट से पास करवा कर राष्ट्रपति से हस्ताक्षर करवा कर दिनांक 15जून 2018 को प्रमोशन में आरक्षण लागू कर दिया।इससे सीधा असर सवर्णों व बैकवर्डो पर पड़ा। चूंकि प्रमोशन मे आरक्षण का लाभ केवल व केवल दलितों को है। अब देश के सवर्णों व बैकवर्डो इस बात को ध्यान  देने की आवश्यकता है  कि यह प्रमोशन में आरक्षण सरकार  द्वारा लागू किया गया है कोर्ट का कोई आदेश नही हैइस प्रकार से भारत की वर्तमान सरकार देश की 77 फ़ीसदी नागरिकों को नजरअंदाज कर जो फैसला ले रही है यह समाज को बांटने वाला फैसला है जो किसी भी सूरत में समाज की सामाजिक समरसता को नुकसान ही पहुंचा सरकार को यह ध्यान देना चाहिए कि उसका कोई भी कदम देशहित समाज हित व नैसर्गिक न्याय की परीक्षा में होना चाहिए यही संविधान की मूल भावना भी है। ( सौरभ सिंह सोमवंशी "प्रयागराज )