भीम ने नियम तोड़ा तो बेरी के भाग्य में आर्ई माता भीमेश्वरी दुर्र्र्र्र्र्र्र्वासा ऋषि के अनुरोध पर मां ने बदला स्थान, महाभारत काल से जुड़ा प्रसंग .........

दुर्र्र्र्र्वाषा ऋषि यहां ठहरे हुए थे उन्हे जब इस घटनाक्रम कापता चला तो वे उसीसमय मां केपासपहुचे और सन्तों के बनाए आश्रम में आकरसेवा स्वीकारकरने की बात कही जिसे मां ने स्वीकार कर लिया यहां पर रिषी दुर्र्र्र्वासा मांकी पूजा अर्र्र्र्र्चना करने लगे रिषी दुर्र्र्र्र्र्वासा दुबलधन से रोजाना मां की आरती करने सुबह शाम आते थे। आज भी वही आरती गायी जाती हैैैै। महाभारत काल से दिन में मां की पूजा दिन में बाहर वाले मंदिर और रात को भीतर अंदर वाले मंदिर में पूजा अर्र्र्र्चना होती ह।

भीम ने नियम तोड़ा तो बेरी के भाग्य में आर्ई माता भीमेश्वरी  दुर्र्र्र्र्र्र्र्वासा ऋषि के अनुरोध पर मां ने बदला स्थान, महाभारत काल से जुड़ा प्रसंग .........

बेरी। बात हजारों साल पुरानी ह। लेकिन बेरी में पहुचतें ही मां कभक्तों को महसूस होता ह कि मानों जो दिख रहा ह। क्षेत्र पर मां भीमेश्वरी देवी की अनुकंपा का असर ऐसा ह कि साल में दो दफा लगने वाले मेले में प्रदेश ही नही पूरे देश से दूर दराज से लाखों लोग पूजा अर्चना के लिए पहुचतें ह।जो कि अपनी श्रद्धा एवं आस्था के साथ मां को सर्र्मित करते हुए परिवार की मंगल कामना करते ह मंदिर क बारे में पुरानेआदमीयों से मंदिर एवं उसकेइतिहास से जुड़ी बात काज्रिक हुआ तो कर्र्र्र्र्र्ई पहलू सामने आए जो कि श्रद्धालुओं क विश्वास को अधिक मजबूत करते ह। मां ने भीम का अंहकार तोड़ा मां की मूर्ति को पांडु पुत्र भीम पाकिस्तान के हिंगजाल पर्वत से लेकर आया था। जब कुरुक्षेत्र में महाभारत चल रहा था तो भगवान कृष्ण ने भीम को कुल देवी मां से युद्ध में विजय श्री का आशीर्वाद लेने भेजा था। भीम ने मां को अपने साथ चलने के लिए कहा तो मां ने पांडु पुत्र से कहा कि मैं तुम्हारे साथ तो चलूंगी, लेकिन तुम मुझे अपनी गोद में रखोगे। रास्ते में जहां भी उतारोगे मैं उस स्थान से आगे नहीं जाऊंगी। भीम ने मां की शर्त मान ली और गोद में उठाकर युद्ध भूमि की तरफ चले। जब भीम मां को लेकर बेरी कस्बे से गुजर रहा था तो भीम को लघुशंका के लिए मां को अपने कंधे से उतारना पड़ा।बाद में मां को वापस चलने के लिए अपनी गोद में उठाने लगा तो मां ने भीम को अपनी शर्त याद दिलाई फिर भीम ने मां की पूजा कर बेरी के बाहर स्थापित कर दिया। तभी से मां को भीमेश्वरी देवी के नाम से जाना जाता हैैैै। बाद मेंयुद्ध समाप्त होन केबाद गंधारी ने मांकामंदिर बनवाया। बेरी में मां के दो मंदिर ह जहां पर दिन क समय मेंबाहर वाले मंदिर में पूजाहोती ह जबकि रात के समय में भीतरवाले मंदिर में पूजाअर्र्र्चनाहोती हइस पहलू को लेकर लोगो के मन कर्र्र्र्ई विचार ह। मां केदरबार में आने वाला हर श्रद्धालु दसबारे में जानना चाहता हैैैै। इस विषय पर बुर्जर्र्र्र्र्र्र्र्गो का कहना ह कि जब भीम ने मांअनुरोध ठुकरा दिया तो उसी दौरान ही दुर्र्र्र्र्वाषा ऋषि यहां ठहरे हुए थे उन्हे जब इस घटनाक्रम कापता चला तो वे उसीसमय मां केपासपहुचे और सन्तों के बनाए आश्रम में आकरसेवा स्वीकारकरने की बात कही जिसे मां ने स्वीकार कर लिया यहां पर रिषी दुर्र्र्र्वासा मांकी पूजा अर्र्र्र्र्चना करने लगे रिषी दुर्र्र्र्र्र्वासा दुबलधन से रोजाना मां की आरती करने सुबह शाम आते थे। आज भी वही आरती गायी जाती हैैैै। महाभारत काल से दिन में मां की पूजा दिन में बाहर वाले मंदिर और रात को भीतर अंदर वाले मंदिर में पूजा अर्र्र्र्चना होती ह।