देश के खाद्यान भण्डारण को समृद्ध बनाने में एचएयू की भूमिका अहम - प्रोफेसर समर

जब प्रदेश संयुक्त पंजाब से अलग हुआ तो उस समय हरियाणा प्रदेश का वर्ष 1966-67 में खाद्यान उत्पादन केवल 2.59 मिलियन टन था। इसके बाद वर्ष 2000-2001 में बढक़र 13.29 मिलियन टन हो गया और अब वर्ष 2019-20 में यह बढक़र 17.86 मिलियन टन हो गया है।

देश के खाद्यान भण्डारण को समृद्ध बनाने में एचएयू की भूमिका अहम - प्रोफेसर समर

हिसार (प्रवीण कुमार) || जब प्रदेश संयुक्त पंजाब से अलग हुआ तो उस समय हरियाणा प्रदेश का वर्ष 1966-67 में खाद्यान उत्पादन केवल 2.59 मिलियन टन था। इसके बाद वर्ष 2000-2001 में बढक़र 13.29 मिलियन टन हो गया और अब वर्ष 2019-20 में यह बढक़र 17.86 मिलियन टन हो गया है। प्रदेश में हरित क्रांति की सफलता व खाद्यान उत्पादन में अपार वृद्धि हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों द्वारा अधिक पैदावार वाली विभिन्न फसलों की किस्में विकसित करना, नई-नई तकनीकें इजाद करना, अथक प्रयासों, लगन, दूरगामी सोच और प्रदेश के किसानों की कड़ी मेहनत का ही परिणाम है। ये विचार चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर समर सिंह ने व्यक्त किए। वे हरियाणा दिवस की पूर्व संध्या पर आयोजित एक प्रेस वार्ता के दौरान पत्रकारों से रूबरू हो रहे थे। उन्होंने कहा कि हरियाणा प्रदेश क्षेत्रफल की दृष्टि से अन्य प्रदेशों की तुलना में बहुत ही छोटा है जबकि देश के खाद्यान भण्डारण व फसल उत्पादन में अग्रणी प्रदेशों में है। आज देशभर के केंद्रीय खाद्यान भण्डारण में प्रदेश का कुल भण्डारण का 16 प्रतिशत है जो अपने आप में बहुत बड़ी उपलब्धि है। इसमें गेहूं 9.3 मिलियन टन और चावल 4.2 मिलियन टन शामिल हैं। आज हरियाणा प्रदेश गेहूं के प्रति हेक्टेयर उत्पादन क्षमता में देश में नंबर वन है। अकेला हरियाणा प्रदेश देश का 60 प्रतिशत बासमती का उत्पादन करता है जबकि कुल चावल उत्पादन में प्रदेश दूसरे स्थान पर है। प्रोफेसर समर सिंह ने बताया कि दलहन व तिलहनी फसलों में बढ़ते उत्पादन को लेकर भी विश्वविद्यालय ने अपनी अलग पहचान बनाई है। उन्होंने प्रदेश के किसानों से आह्वान किया है कि वे विश्वविद्यालय द्वारा विकसित आधुनिक तकनीकों व विभिन्न फसलों की किस्मों का लाभ उठाएं।

उन्नत किस्मों व आधुनिक तकनीकों से प्रदेश का किसान हो रहा है समृद्ध
कुलपति प्रोफेसर समर सिंह ने बताया कि पिछले 20 वर्षों में गेहूं व चावल के उत्पादन में रिकार्ड वृद्धि हुई है। विश्वविद्यालय द्वारा विकसित उन्नत किस्मों व आधुनिक तकनीकों से प्रदेश का किसान समृद्ध और खुशहाल हो रहा है। उन्होंने बताया कि वर्ष 1966-67 में प्रदेश में गेहूं का उत्पादन मात्र 14.25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर था। जो वर्ष 2000-01 में 41.06 क्विंटल प्रति हेक्टेयर और वर्ष 2019-20 में 46.87 क्विंटल प्रति हेक्टेयर हो गया है। देश में औसतन गेहूं का उत्पादन 34.21 क्विंटल प्रति हेक्टेयर आंका गया है जबकि प्रदेश में गेहूं का औसतन उत्पादन 46.87 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है। मौजूदा समय में विश्वविद्यालय ने गेहूं की डब्ल्यूएच 1187 व डब्ल्यूएच 1105 जैसी उन्नत किस्में विकसित की हैं जिनका उत्पादन प्रति हेक्टेयर 61.2 क्विंटल से 71.6 क्विंटल तक आंका गया है। अब तक विश्वविद्यालय द्वारा गेहूं की 23 किस्मों को विकसित किया गया है जिनमें 14 किस्में राष्ट्रीय स्तर पर जबकि 9 किस्में प्रदेश स्तर के किसानों के लिए जारी की गई हैं। इसी प्रकार बाजरे की 21, जौ की 8 किस्में, मक्का की 15, दलहन की 36, तिलहन की 29, कपास की 24, चारा की 34, गन्ने की 8, औषधीय एवं सुगंधित पौधों की 8, सब्जियों की 27 और बागवानी की 4 किस्में विकसित की हैं।
चावल उत्पादन में भी हुई रिकार्ड बढ़ोतरी
इसी प्रकार वर्ष 1966-67 में प्रदेश में चावल का उत्पादन मात्र 11.61 क्विंटल प्रति हेक्टेयर था। जो वर्ष 2000-01 में 25.57 क्विंटल प्रति हेक्टेयर और वर्ष 2019-20 में 33.34 क्विंटल प्रति हेक्टेयर हो गया है। देश में औसतन चावल का उत्पादन 27.05 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है जबकि प्रदेश में चावल का औसतन उत्पादन 33.34 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है। अब तक विश्वविद्यालय द्वारा चावल की 12 किस्में विकसित की गई हैं जिनमें 11 किस्मों को प्रदेश व 1 किस्म को देशभर के लिए जारी किया गया है।
ये रही विश्वविद्यालय की उपलब्धियां
कुलपति प्रोफेसर समर सिंह ने विश्वविद्यालय की उपलब्धियों का जिक्र करते हुए आगे बताया कि विश्वविद्यालय की स्थापना से लेकर अब तक विश्वविद्यालय ने विभिन्न फसलों की 250 नई व उन्नत किस्मेें विकसित की हैं जो रोग प्रतिरोधी व अधिक पैदावार देने वाली हैं। अब तक 533 राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एमओयू साइन हो चुके हैं। अभी तक विश्वविद्यालय को 17  पेटेंट, 5 कॉपीराइट और 2 डिजाइनों को स्वीकृति मिल चुकी है। इसके अलावा 49 पेटेंट, 1 कॉपीराइट व 2 डिजाइन विश्वविद्यालय की ओर से स्वीकृति के लिए अप्लाई किए गए हैं। उन्होंने बताया कि विश्वविद्यालय को राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई पुरस्कारों से भी नवाजा जा चुका है। इनमें से देश के सभी कृषि विश्वविद्यालयों मेें भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद द्वारा मिली प्रथम राष्ट्रीय पुरस्कार व हाल ही में विश्वविद्यालय को मिली प्रथम अटल रैंकिंग शामिल हैं।
महिलाओं, युवाओं व किसानों के उत्थान के लिए प्रयासरत है विश्वविद्यालय
विश्वविद्यालय ग्रामीण व शहरी महिलाओं, युवाओं व प्रदेश के किसानों को स्वावलम्बी, समृद्ध और आर्थिक रूप से संपन्न बनाने की दिशा में प्रयासरत है। इसमें महिलाओं के लिए गृह विज्ञान महाविद्यालय द्वारा विभिन्न प्रकार के कोर्स व सायना नेहवाल कृषि प्रौद्योगिकी प्रशिक्षण एवं शिक्षण संस्थान द्वारा कराए जाने वाले कोर्स व प्रशिक्षण शामिल हैं। इसी प्रकार विश्वविद्यालय में कृषि अवशेष प्रबंधन हेतु नवाचार केंद्र स्थापित किया गया है, जिसके शुरू होने के बाद बायोगैस व सीएनजी गैस के साथ-साथ कृषि अवशेषों से खाद व बिजली उत्पादन भी शुरू हो जाएगा। दीन दयाल उपाध्याय जैविक खेती उत्कृष्टता केंद्र भी जैविक खेती की दिशा में अहम भूमिका निभा रहा है। विश्वविद्यालय ने उत्तर भारत के एकमात्र व देश के दूसरे एग्री बिजनेस सेंटर की शुरूआत की है, जिसमें कोई भी किसान, युवा, गृहिणी, विद्यार्थी इत्यादि कृषि व कृषि से संबंधित इनोवेटिव आइडिया को लेकर इस केंद्र के माध्यम से अपना व्यवसाय स्थापित कर सकता है। फसल विविधिकरण, कृषि वैज्ञानिकों की सलाह व बेहतर तकनीकों को अपनाकर किसान अपनी आय में वृद्धि कर सकते हैं। बागवानी, कृषि वानिकी, मधुमक्खी पालन, पुष्प उत्पादन, पशुपालन, मुर्गीपालन, खुम्ब उत्पादन, मत्स्य पालन, केंचुआ खाद उत्पादन इत्यादि व्यवसाय अपनाकर किसान छोटी जोत होते हुए भी अपनी आमदनी में इजाफा कर सकते हैं। उन्नत किस्मों के बीजों के प्रयोग, बीज उपचार, जैविक खाद, समन्वित कीट प्रबंधन, समन्वित खाद प्रबंधन, जैविक खेती एवं रासायनिक उर्वरकों के कम इस्तेमाल से किसान खेती में होने वाले खर्चें को कम करके आर्थिक रूप से ज्यादा समृद्ध हो सकते हैं। इसी प्रकार महिलाओं के लिए विश्वविद्यालय के प्रत्येक जिले में स्थापित कृषि विज्ञान केन्द्रों के माध्यम से सिलाई-कढ़ार्ई, डेयरी फार्मिगं, फल व सब्जी इत्यादि को लेकर दिए जाने वाले प्रशिक्षण के द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों में स्वरोजगार स्थापित कर अपनी आजीविका चला सकती हैं। खेती से जुड़ी समस्याओं के निदान के लिए विश्वविद्यालय की नि:शुल्क दूरभाष सेवा व मौसम से संबंधित जानकारी के लिए ई-मौसम के माध्यम से देश व प्रदेश के लाखों किसान लाभ उठा रहें हैं।